DIL KI KALAM SE

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जिन्दगी का सच

Posted On: 5 Nov, 2012 Others में

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विरह की बेला चुप सी आती
कर्मभूमि और गृहस्ती में
होले होले कदम बढाती
सुख समृधि को, मिटा
अंतर्मन में भेद करा
मन की शांति, भंग कर जाती
काल चक्र सा एक रचा
रह रह कर
भ्रम जाल में हमें फंसाती
ढंग बेढंग के करतब करा
इन्सान से हमको,
पशु बनाती
वक़्त की नजाकत को समझ
नट बना, इंसान नचाती
ऐसा अपना रंग दिखाती
जब तक समझ में
आता कुछ भी
तब तक सब कुछ
धुल में सब कुछ ये मिलाती
पल भर में ये नेत्र भिगो
हमारे अस्तिव का बोध कराती
लहर बन दिल के
तटबंधों से ये टकराती
सुदृढ सुकोमल हृदय
को नीरसता से भर जाती
माधुर्यहीन कर जग की
सौन्दर्यता को
जीते जी ही नरक बनाती
अभिज्ञान का जो
करें प्रयास तब तक
जिंदगी पूरी हो जाती
ऐसा हृदय में दर्द जगाती
क्षण भर में ही विरह
से जिंदगी तबाह हो जाती

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14 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Lahar के द्वारा
November 8, 2012

वाह ! क्या खूब कहा आपने ? जिंदगी का सच ???

    phoolsingh के द्वारा
    November 9, 2012

    आपका सहृदय से शुक्रिया……. फूल सिंह

yogi sarswat के द्वारा
November 8, 2012

रह रह कर भ्रम जाल में हमें फंसाती ढंग बेढंग के करतब करा इन्सान से हमको, पशु बनाती वक़्त की नजाकत को समझ नट बना, इंसान नचाती ऐसा अपना रंग दिखाती जब तक समझ में आता कुछ भी तब तक सब कुछ धुल में सब कुछ ये मिलाती बहुत खूब , सुन्दर अभिव्यक्ति ! श्री फूल सिंह जी , बधाई आपको

    phoolsingh के द्वारा
    November 9, 2012

    योगी जी प्रणाम………. आपका सहृदय से शुक्रिया……. फूल सिंह

rekhafbd के द्वारा
November 7, 2012

फूल सिंह जी अभिज्ञान का जो करें प्रयास तब तक जिंदगी पूरी हो जाती ऐसा हृदय में दर्द जगाती क्षण भर में ही विरह से जिंदगी तबाह हो जाती अति सुंदर अभिव्यक्ति ,बधाई

    phoolsingh के द्वारा
    November 9, 2012

    रेखा जी सदर प्रणाम……. आपका सहृदय से शुक्रिया……. फूल सिंह

yatindranathchaturvedi के द्वारा
November 7, 2012

अद्भुत,,बधाई स्वीकार करें आदरणीय

    phoolsingh के द्वारा
    November 9, 2012

    यातिंदर जी प्रणाम……. आपका बहुत बहुत धन्यवाद… फूल सिंह

Santlal Karun के द्वारा
November 7, 2012

अच्छी रचनात्मकता, अर्थपरक, प्रभावपूर्ण; साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! “जब तक समझ में आता कुछ भी तब तक सब कुछ धुल में सब कुछ ये मिलाती पल भर में ये नेत्र भिगो हमारे अस्तिव का बोध कराती लहर बन दिल के तटबंधों से ये टकराती सुदृढ सुकोमल हृदय को नीरसता से भर जाती माधुर्यहीन कर जग की सौन्दर्यता को जीते जी ही नरक बनाती”

    phoolsingh के द्वारा
    November 9, 2012

    करुण जी प्रणाम……… आपका बहुत बहुत शुक्रिया………. फूल सिंह

nishamittal के द्वारा
November 7, 2012

अभिज्ञान का जो करें प्रयास तब तक जिंदगी पूरी हो जाती ऐसा हृदय में दर्द जगाती क्षण भर में ही विरह से जिंदगी तबाह हो जाती आपकी रचना अच्छी लगी फूल सिंह जी.

    phoolsingh के द्वारा
    November 9, 2012

    निशा जी प्रणाम…… आपका सहृदय से शुक्रगुजार…….. फूल सिंह

akraktale के द्वारा
November 6, 2012

ऐसा हृदय में दर्द जगाती क्षण भर में ही विरह से जिंदगी तबाह हो जाती विरह के गम कि गहराई के दुष्परिणाम को इंगित करती सुन्दर रचना के लिए हार्दिक बधाई आ. फूलसिंह जी.

    phoolsingh के द्वारा
    November 9, 2012

    अशोक जी प्रणाम, आपका बहुत बहुत शुक्रिया………….. फूल सिंह


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