DIL KI KALAM SE

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दास्ताँ है यें जीव की

Posted On: 16 Nov, 2012 Others में

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दास्ताँ है यें जीव की
वस्त्र ढ़के, मृत शरीर की
वृद्ध होते ही छोड़ चलें
नींव लिखने, नई तकदीर की

प्रीत जाती जब, हृदय जग
दो तनो कर, एक मन
बीज से जाता पराग बन
भू धरा पर ले जन्म
पंचतत्वो का कर संगम
पाया जग में मानव तन

शिशु से किशोर तक
रूप बनाया मन भावन
अटखेलियाँ कर कर के
हर्षित करता सबका मन
शिक्षा का वो कर अध्ययन
ज्ञान से करता जग रोशन

अध्यन का समय हुआ ख़त्म
युवा अवस्था में बढ़ा कदम
घर परिवार के सारे अक्ष
उसके आते अब समक्ष
कमाने का अब स्रोत बना
गृहस्त जीवन में बढ़ा कदम

धर्म बेटी बेटे का निर्वाह कर
मात पिता की सेवा कर
कर्तव्य के अपने पालन में
चित को अपने नियंत्रित कर
कर्म धर्म का मूल्यांकन कर
वानप्रस्त में प्रस्थान कर
इस तन को फिर जाता छोड़
प्राणों को अपने त्याग कर

यात्रा है ये जीव की
वस्त्र ढ़के, शरीर की
कालचक्र का चक्रा घूमे
नींव रखने फिर एक
नई तकदीर की

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20 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

alkargupta1 के द्वारा
November 19, 2012

जीव की जन्म से मृत्यु पर्यन्त अति सुन्दर अभिव्यक्ति फूल सिंह जी बधाई

    phoolsingh के द्वारा
    November 22, 2012

    अलका जी प्रणाम.. आपका बहुत बहुत धन्यवाद….. फूल सिंह

yogi sarswat के द्वारा
November 19, 2012

मात पिता की सेवा कर कर्तव्य के अपने पालन में चित को अपने नियंत्रित कर कर्म धर्म का मूल्यांकन कर वानप्रस्त में प्रस्थान कर इस तन को फिर जाता छोड़ प्राणों को अपने त्याग कर यात्रा है ये जीव की वस्त्र ढ़के, शरीर की स्वागत है आपका श्री फूल सिंह जी , एक बेहतरीन और व्यावहारिक रचना के लिए

    phoolsingh के द्वारा
    November 22, 2012

    योगी नमस्कार…… आपका बहुत बहुत शुक्रिया……….. फूल सिंह

    phoolsingh के द्वारा
    November 22, 2012

    योगी जी नमस्कार…… आपका बहुत बहुत शुक्रिया……….. फूल सिंह

Mohinder Kumar के द्वारा
November 19, 2012

सुन्दर कविता या नजम कह लिजिये इसको मदन जी क्योंकि यह गजल के पैरामीटर पर सही नहीं बैठती.

Mohinder Kumar के द्वारा
November 19, 2012

फ़ूल सिंह जी, जगविदित है कि समय और इतिहास अपने आप को बार बार दौहराता है. जीवन के लिये भी यही सत्य है… जन्म, मरण और फ़िर जन्म ही जीवन का चक्र है.. पुरातन को नवीन विस्थापित करता है. सार पूर्ण रचना के लिये बधाई.

    phoolsingh के द्वारा
    November 22, 2012

    मोहिंदर जी नमस्कार…… आपके तो कमेंट ही मेरे बहुत मायेने रखते है………..आप बहुत बहुत धन्यवाद……. फूल सिंह

rekhafbd के द्वारा
November 18, 2012

फूल सिंह जी गृहस्त जीवन में बढ़ा कदम धर्म बेटी बेटे का निर्वाह कर मात पिता की सेवा कर कर्तव्य के अपने पालन में,अति सुंदर अभिव्यक्ति ,बधाई

    phoolsingh के द्वारा
    November 22, 2012

    रेखा जी नमस्कार……….. आपके कमेंट के बहुत बहुत धन्यवाद…… फूल सिंह

yatindranathchaturvedi के द्वारा
November 18, 2012

उम्दा

    phoolsingh के द्वारा
    November 22, 2012

    यातिंदर जी प्रणाम….. आपका बहुत बहुत धन्यवाद….. फूल सिंह

Sushma Gupta के द्वारा
November 17, 2012

प्रिय फूल सिंह जी,मानव के जन्म से लेकर मृत्यु तक के पूर्ण चक्र को आपने अपनी रचना में साकार कर दिया, सुन्दर अभिव्यक्ति…बधाई स्वीकारें …

    phoolsingh के द्वारा
    November 22, 2012

    शुस्मा जी नमस्कार… आपका बहुत बहुत धन्यवाद…. फूल सिंह

akraktale के द्वारा
November 17, 2012

मानव कालचक्र कि सुन्दर मनोभिव्यक्ति आद. फूलसिंह जी बधाई स्वीकारें.

    phoolsingh के द्वारा
    November 22, 2012

    अशोका जी प्रणाम…. आपका बहुत बहुत शुक्रिया……. फूल सिंह

Madan Mohan saxena के द्वारा
November 16, 2012

बहुत सुंदर भावनायें और शब्द भी …बेह्तरीन अभिव्यक्ति …!!शुभकामनायें.

    phoolsingh के द्वारा
    November 22, 2012

    मोहन जी प्रणाम…… आपके कमेंट के लिए बहुत बहुत शुक्रिया…. फूल सिंह

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
November 16, 2012

यात्रा है ये जीव की वस्त्र ढ़के, शरीर की कालचक्र का चक्रा घूमे नींव रखने फिर एक नई तकदीर की शानदार अभिव्यक्ति, सर जी बधाई. स्सद्र

    phoolsingh के द्वारा
    November 22, 2012

    प्रदीप जी नमस्कार…… आपके तो कमेंट ही मेरे बहुत मायेने रखते है…..आपका धन्यवाद……. फूल सिंह


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