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गीता के १८ अध्याय

Posted On: 4 Dec, 2012 Others में

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चारो ओर, खड़े है सैनिक
युद्ध में जीत दिलाने को
शोक करुणा से, अभिभूत है अर्जुन
देख, रक्त सम्बन्धी रिश्तेदारों को
खड़े हुए है अब कृष्णा
उसे शोक से मुक्त कराने को
देहान्तरं की प्रक्रिया कैसी
संक्षेप में ये समझाने को
अजर अमर है जीवात्मा
स्मरण रखना इस ज्ञान को
खड़ा हो जा धनुष उठा
अपना धर्म निभाने को
मरे हुओ को मार डालना
जग में नाम कराने को
अपने पराये से मुहँ मोड़ लो
पाप पुण्य की चिंता छोड़
कर्म अकर्म को अपर्ण कर दो
मुझ अन्तर्यामी परमेश्वर को
निष्काम सेवा में, ध्यान लगा दो
स्वरुप सिद्दि पाने को
भौतिक जगत में आता प्राणी
कर्म बंधन से मुक्त हो जाने को
गुरु शरण में अभी चला जा
दिव्य ज्ञान की जोत जगाने को
कर्म योग का मार्ग अपना लो
इस जग से शीघ्र तर जाने को
जीव होता जग में हरदम
जन्म मरण से मुक्ति पाने को
कोई भी लो तुम मार्ग अपना
मुझ प्रेमश्वर को पाने को
कर्मफलो का परित्याग करो तुम
उत्तरदायित्व अपने निभाने को
भागने से ना मुक्ति होगी
याद रखना इस तथ्य को
पूजा जप ताप यघ भी करना
भक्ति रस में, खो जाने को
इन्दिर्यों को अपनी, नियंत्रित करना
परमात्मा में लीन, हो जाने को
सब कुछ अपना अपर्ण कर दो
मुझ अन्तर्यामी परमेश्वर को
अर्जुन से फिर बोले भगवान
परमसत्य को अब तू जान
भक्ति का मार्ग बड़ा महान
सांख्य योग करो, चाहे ध्यान
पर भक्ति से मिलते भगवान
जीवनभर करना, कोई भी काम
क्षणभर भी ना, भूलो भगवान
आजीवन स्मरण करने से
अंतत मिले परमधाम
इर्षा दुवेष को दे तू त्याग
गूढ़ ज्ञान दू तू तुझको आज
जिसमे भक्ति ना हो
ना मुझमे विस्वास
उसको मृत तू क्षण में जान
मुझसे उत्त्पन्न ये संसार
समस्त ब्रमांड का मैं भगवान
मैं अजन्मा मैं अनादि
कण कण मैं ही विधमान
निरंतर मुझ में चित लगा
तेरा कर दूंगा उद्धार
मैं शेष हूँ मैं महेश हूँ
मैं ही ब्रमांड का हूँ प्रकाश
शस्त्रधारियों मैं ही राम
हर जीव की मैं हूँ स्वास
विराट रूप जो मेरा देखो
विधमान इसमें ब्रमांड देखो
पातळ धरती और ये आकाश
मिलेंगा उपस्थित ये संसार
आदि ना अंत मिलेगा तुमको
क्योंकि मैं ही अनंत भगवान
जीवन अपना साकार कर
चित मुझ में एकार्ग कर
अविचलित भक्ति का अभ्यास कर
शंकाओ का परित्याग कर
मैं ही सबका मूल स्रोत
मुझमे नहीं है कोई भी दोष
दिव्य ज्ञान का खोलू द्वार
एकार्ग हो तू सुन ले आज
प्रक्रति के ये तीन गुण
सत रज और तमोगुण
इन गुणों से परे हो
भक्ति करो परमेश्वर की तुम
संसार है पीपल का वृक्ष
जड़ उपर और नीचे सर
कही ना आदि कही ना अंत
यही सत्य और शास्वत तत्व
जीव होते है क्षर अक्षर
जिनका पालनकर्ता है ईश्वर
यघ परायणता और वेदा अध्यन
दान अहिंसा और आत्मस्यंम
कहलाते ये दैविक गुण
दंभ दर्प और अभिमान
क्रोध कठोरता और अज्ञान
अपनाना ना ये आसुरी गुण
सत का तू पालन कर
सब कुछ मुजको अर्पण कर
ब्रमांड का केंद्र मैं
मैं ही सबका हूँ ईश्वर

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14 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yogi sarswat के द्वारा
December 6, 2012

मैं ही सबका मूल स्रोत मुझमे नहीं है कोई भी दोष दिव्य ज्ञान का खोलू द्वार एकार्ग हो तू सुन ले आज प्रक्रति के ये तीन गुण सत रज और तमोगुण इन गुणों से परे हो भक्ति करो परमेश्वर की तुम संसार है पीपल का वृक्ष जड़ उपर और नीचे सर कही ना आदि कही ना अंत यही सत्य और शास्वत तत्व जीव होते है क्षर अक्षर जिनका पालनकर्ता है ईश्वर ये तो सिर्फ एक अंश है आपकी विस्तृत एवं सराहनीय काव्यात्मक प्रतिभा का ! गीता के श्लोक बहुत पढ़े हैं किन्तु उसका अर्थ काव्य के रूप में पढ़कर अच्छा लगा श्री फूल सिंह जी !

    phoolsingh के द्वारा
    December 7, 2012

    योगी जी नमस्कार, आपका बहुत बहुत धन्यवाद ……….की आपको मेरी ये रचना पसंद आई मेरे लिए यह एक अच्छी बात है………. फूल सिंह

akraktale के द्वारा
December 6, 2012

आदरणीय फूलसिंह जी                सादर, श्रीमद भगवत गीता के अंतिम अध्याय को लक्ष्य कर आपने सुन्दर रचना का निर्माण किया है गीता के संस्कृत श्लोकों को पढ़ पाना ही बड़ा दुष्कर कृत्य है तब उसका हिंदी अनुवाद आवश्यक हो जाता है. आपको बहुत बहुत बधाई.                    कृपया रचना को और आकर्षक बनाने के लिए कुछ त्रुटियों से बचने का प्रयास यदि आप करें तो अति उत्तम होगा. जैसे आपकी एक पंक्ति -गूढ़ ज्ञान दू तू तुझको आज- इसमें तु के साथ तुझको लिखा है दोनों एक ही बातें हैं फिर एक जगह आप शायद वर्णन वट वृक्ष का कर रहे हैं और उसे पीपल लिख रहे हैं.मुझे आशा है आप मेरी बातों को अन्यथा नहीं लेंगे.सादर.

    phoolsingh के द्वारा
    December 7, 2012

    अशोक जी नमस्कार, आपका बहुत बहुत धन्यवाद ……….की आपको मेरी ये रचना पसंद आई मेरे लिए यह एक अच्छी बात है……….मैं कोशिश करूंगा आपकी बातो का अमल करने का फूल सिंह

rekhafbd के द्वारा
December 5, 2012

फूल सिंह जी मैं अजन्मा मैं अनादि कण कण मैं ही विधमान निरंतर मुझ में चित लगा तेरा कर दूंगा उद्धार,गीता का दिव्य सन्देश देती हुई रचना पर हार्दिक बधाई

    phoolsingh के द्वारा
    December 7, 2012

    रेखा जी नमस्कार, आपका बहुत बहुत धन्यवाद ……….की आपको मेरी ये रचना पसंद आई मेरे लिए यह एक अच्छी बात है………. फूल सिंह

deepaksharmakuluvi के द्वारा
December 5, 2012

शानदार है भाई

    phoolsingh के द्वारा
    December 7, 2012

    शर्मा जी नमस्कार, आपका बहुत बहुत धन्यवाद ……….की आपको मेरी ये रचना पसंद आई मेरे लिए यह एक अच्छी बात है………. फूल सिंह

Santosh Kumar के द्वारा
December 5, 2012

श्रद्धेय ,..सादर प्रणाम रचना पर कुछ कहने के लिए न शब्द हैं न ही क्षमता ,….ज्ञानदायिनी रचना के लिए कोटिशः अभिनन्दन

    phoolsingh के द्वारा
    December 7, 2012

    संतोष जी नमस्कार, आपका बहुत बहुत धन्यवाद ……….की आपको मेरी ये रचना पसंद आई मेरे लिए यह एक अच्छी बात है………. फूल सिंह

nishamittal के द्वारा
December 4, 2012

फूल सिंह जी गीता के दिव्य और गहन ज्ञान को आपने अपनी रचना में बहुत खूबसूरती से समझाया है.

    phoolsingh के द्वारा
    December 7, 2012

    नीशा जी नमस्कार, आपका बहुत बहुत धन्यवाद ……….की आपको मेरी ये रचना पसंद आई मेरे लिए यह एक अच्छी बात है………. फूल सिंह

December 4, 2012

फूल सिंह जी .बहुत ही उम्दा प्रस्तुति और ज्ञान का सागर बधाई ,,,,,,,,,,,,,,अर्जुन से फिर बोले भगवान परमसत्य को अब तू जान भक्ति का मार्ग बड़ा महान सांख्य योग करो, चाहे ध्यान पर भक्ति से मिलते भगवान जीवनभर करना, कोई भी काम क्षणभर भी ना, भूलो भगवान

    phoolsingh के द्वारा
    December 7, 2012

    शर्मा जी नमस्कार, आपका बहुत बहुत धन्यवाद ……….की आपको मेरी ये रचना पसंद आई मेरे लिए यह एक अच्छी बात है………. फूल सिंह


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